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Archive for June, 2009

यामिनी…

भोर जागने को है,

पर उससे पहले जाग जाती है यामिनी
टूटे सपनों को बुहारती,

आँगन द्वार पूरती चौक हल्दी आटे से
भीगी धोती में लिपटी,

लटों से झरती ओस
फटकारती है जब जब

फूट पड़ती हैं किरणें पीली, नारंगी, सुनहरी
और… फूट पड़ता है अधर-कलियों से लोक गीत

चकिया की घरर-घरर पर थिरक-थिरक जाता है
तब ……… जुट जाती है दो जून की रोटी

और ढेर सारी आशाएं
चौका-पानी खेत-खलियान,

दौड़-भाग करती चकरघिन्नी सी
ठंडी नहीं होती चूल्हे की आग

कब सोयेगी यामिनी
क्या रात भर…………………….??

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शाम को लगभग चार-पांच बजे घंटियों की  आवाज़ सुनते ही गली के लगभग सभी बच्चे चैतन्य हो जाया करते थे। ‘पैवलाव’ के सिद्वान्त सा सौ फीसदी सम्बन्ध घंटी, लार व कुल्फी के बीच जो जुड़ा हुआ था।
अमूमन लोगों को कुल्फी वाले व बाइस्कोप वाले की घंटियों में फर्क नज़र नहीं आता था। पर मैं समझ जाती थी कि ये  कुल्फी वाला है और वो बाइस्कोप वाला। दोनों की घंटियों की ध्वनि में भी अन्तर था और घंटी में बंधी डोरी खीचने की स्टाइल में भी। जिस दिन पास में पैसे होते, इन्तज़ार बहुत खलता। घंटी बजते ही बाहर निकल आती। पांच पैसे मे सादी कुल्फी और दस पैसे में ईनाम वाली। ईनाम वाली कुल्फी में कुल्फी के साथ ही पैसे भी जमे रहते थे। किसी मे दो पैसे, किसी में तीन, किसी मे पांच, किसी मे दस और किसी-किसी में चवन्नी। कुल्फी निकालते समय कभी भगवान का नाम लेती व कभी-कभी दस की उल्टी गिनती गिनकर निकालती।
उस दिन उल्टी गिनती गिनकर पांचवे नं0 की कुल्फी उसके बाॅक्स से निकाली थी, क्योंकि पांच मेरा लकी नं0 था। कुल्फी में जमी चवन्नी देखकर आंखों की चमक दुगुनी व क्षणिक अमीर होने के एहसास से फूल गई थी। ठेले के पास ख़डे अन्य बच्चों के चेहरे देख अपनी जीत दर्शाती धीरे-2 कुल्फी का आनन्द ले रही थी।
इसी बीच बाइस्कोप वाला घंटी बजाता हुआ गली में आया। मन और प्रसन्न हो गया, क्योंकि आज तो पैसे भी बहुत थे। उसके ठेले पर बाइस्कोप तथा उसी के बगल में एक लम्बी लकड़ी की बैंच उल्टी रखी होती थी। वो जहाँ बच्चों की भीड़ देखता, वहीं ठेला रोक कर बैंच उतार देता। हम बच्चे एक दूसरे को धक्का देते हुए बैंच पर अपनी जगह पा लेते। बाइस्कोप में अन्दर देखने के लिए छः छेद होते थे, जिनमें ढक्कन लगे रहते थे। वो जैसे ही ढक्कन हटाता, बच्चे अपना-अपना चेहरा उन छेदों पर फिट कर लेते और दोनो साइड हाथों से बन्द कर लेते। इससे एक तो बाहर की रौशनी अन्दर नहीं आती और दूसरा जो महत्वपूर्ण था कि कोई दूसरा बच्चा साइड से अन्दर झांक न ले।
बाइस्कोप में सबसे पहले रंग बिरंगी टूटी चूडियों की भिन्न-भिन्न कलाकृतियां दिखतीं। कभी गोल, त्रिकोण, चैकोर, व ष्टकोणींय भिन्न-भिन्न आकार के आलेखन दिखाता। इतनी देर में बाकी सैटिंग कर लेता था । बाइस्कोप के ऊपर रखे ग्रामोफोन में रिकार्ड लगाकर गाने बजाता और अन्दर बाइस्कोप मे भिन्न-भिन्न पत्र-पत्रिकाओं से बेतरतीब काटे गए नायक-नायिकाओ के चित्र एक रील में चिपके से चल पड़ते। रिकार्ड में गाना बजता ‘हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपटटा मलमल का’ और कभी ’कजरा मोहब्बत वाला’। गीतों व चित्रों में कोई तारतम्य नहीं होता। भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में मूक चित्र आगे खिसकते जाते और साथ में गीत अपनी अलग धुन छेड़ते। पर  उस समय तो हम बच्चों का यही सिनेमा था। सच कहूँ उस दिन दो, तीन नहीं पूरे पांच बार बाइस्कोप देखा था। ईनाम वाली चवन्नी भी पूरी खर्च हो गई थी।
कुल्फीवाला व बाइस्कोप वाला तो रोज़ आता, पर पैसे तो रोज-रोज नहीं होते थे। दूसरे दिन फिर घंटी बजी। रोज की तरह फिर बाहर निकली। परन्तु उस दिन मैं, उन बच्चों वाली लाइन में खड़ी थी, जिनकी आंखों में चवन्नी की चमक भर थी और जो कुल्फी के नाम पर सिर्फ लार घुटक रहे थे।
मैं उस दिन न कुल्फी खा सकती थी और न बाइस्कोप देख सकती थी। यहां तक कि सादी कुल्फी खाने के भी पैसे नहीं थे। बाइस्कोप वाले की बैंच पर उस दिन पूरे छैः बच्चे भी तो नहीं थे। तीन ही बच्चे बाइस्कोप देख रहे थे। बाकी और तीन छेदों में तो वो दूध वाले डिब्बे के ढक्कन बन्द किये था। रील चला ही रहा था, ग्रामोफोन पर रिकार्ड बजा ही रहा था, अरे बाकी ढक्कन खोल देता तो उसका क्या जा रहा था। लेकिन नहीं! खैर खिसयानी बिल्ली सी ताक में खड़ी रही। फिर धीरे से खाली बैंच पर जैसे ही मैनें बैठने की कोशिश की कि मुनिया ने मुझे कुल्हे से धक्का देकर खिसका दिया, मैं गिरते-गिरते बची और सपना टूट गया।

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बाहर बैठक में बैठे कभी ’कमथान साहब’ के मुंह लगा, कभी बटेश्वरी चाचा के तो कभी ’बहर साहब’ के । बारी-बारी सभी के लबों से होता हुआ बाबूजी के मुंह आ लगा। इसी बीच न जाने कितने विषयों पर चर्चा होती । कितने निर्णय लिये जाते । मसलहों व मशविरों के बाद पारिवारिक व सामाजिक फैसले लिए जाते। फिर कुछ शेर, क़ता, गज़लें व नज़्मों का आदान-प्रदान होता। छोटी-मोटी नशिस्त तो आए दिन यूं ही हो जाया करती थी । गर्म वार्ताओं के बीच ठण्डे होते हुक्के की जाने कितनी बार हम बच्चों को आग व तम्बाकू बदलनी पड़ती थी ।
कहने को तो ये नशा था परन्तु इसके पीछे छुपी हुई भारतीय संस्कृति की एकता को मैं आज तक महसूस करती हूँ । वो एक हुक्का ! एक परिवार नहीं , कई परिवार के बुजुर्गो को एक जगह एकत्र कर एक दूसरे के सुख-दुःख बांटता, सलाह मशविरा का नेक कार्य करता जैसे वो हुक्का नहीं समाज का व्यवस्थापक हो।
वो एक हुक्का जब-जब गुडगुड़ाता, कोई न कोई नेक कार्य करता। कभी आपसी सुख दुःख बांटता, कभी संयुक्त परिवारों को और-और मजबूत बनाता और कभी-कभी तो चिलम की चमकती आग के समान कई चिंतन चमक कर ऐसे कारगर हो जाते कि परिवार व समाज की दशा और दिशा ही बदल जाती। वो बेजान परन्तु जानदार हुक्का बैठक के केन्द्र में ससम्मान बारी-बारी से ऐसे गुड़गुड़ाता, मानो भारतीय संस्कृति की कहानी कह रहा हो।

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बहुत मज़ा आता था उसे पत्थर मारने में । हम बच्चों की टोली पत्थर मारते हुए जब तक उसे गली के बाहर नहीं खदेड़ देती,जब तक चैन नहीं लेती थी। वो भी पलट-पलट कर दौड़ाती थी। बहुत अच्छा लगता था चूहे-बिल्ली के खेल जैसा। वह अक्सर तीसरे-चैथे दिन आती और गली-मोहल्ले की साबित ईटें जमीन पर पटक कर टुकड़े-टुकडे़ कर देती और फिर अगली ईंट की तलाश में आगे बढ़ जाती। ये क्रम न जाने कितने वर्षो तक चलता रहा और  हम सब बच्चे उसे पगलिया-पगलिया कहकर चिढ़ाते रहे। पर बालमन ये न समझ पाया कि पागल कौन है? समझ आने पर पता लगा कि उसके तीन बच्चे साबित ईंट की कच्ची दीवार के नीचे दबकर मर गए थे शायद इसी वजह से उसे ईंट से चिढ हो गई थी। इस दुख को मातृत्व सहन नहीं कर पाया। परिणाम स्वरूप जीवन-पर्यन्त टूटे हृदय के असहनीय दुःख को ईंट के टुकड़ो में उजागर करता रहा।

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हर जगह होली जलने के बाद रंग खेला जाता, पर हमारे घर होलिका दहन वाले दिन ही सुबह रंग खेलने की परम्परा है जिसे रंगपासी कहते हैं। सबसे पहले रामजी चाचा हमारी मां पर रंग डालते थे सबसे बड़ी भाभी जो थीं । चाहे कितने अच्छे कपड़े पहने हो बदलने का कोई मौका न देते और रंग डाल देते। फिर जो रंग आंगन में खेला जाता वो देखने लायक होता। भरा पूरा परिवार, रंगों से से लिपे पुते चेहरे और-और पोते जाते। और जब श्याम चाचा वाली चाची को आंगन में घसीटा जाता तो उनके दोनो बच्चे दहाड़े मार-मार कर रोते। वो बच्चों के बहाने से भागतीं तब तक एक बाल्टी रंग और पड़ जाता। कोई किसी की नहीं सुनता । अन्त में सभी देवर भाभियों के गुलाल लगाकर पैर छूते।
पर आज जिस आंगन में होली जलती थी, खेली जाती थी वहाँ अब दीवार है। वहाँ रंगपासी नहीं उदासी है। रिश्तों में खटासी है और सबसे बड़ी बात अब राम जी चाचा भी तो नहीं हैं। होली का उत्साह तो वो अपने साथ ही ले गये। सारे रंग फीके पड़ गए। मेरी मां ने तो तबसे होली ही  नहीं खेली। रंगपासी नहीं रंगबासी हो गए।

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पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे । दादी-बाबा, ताई-ताऊ, चाचा-चाची, बुआ, भइया, दीदी, मां-पिताजी सभी तो एक साथ रहते थे । एक चूल्हा जलता था। सुबह की जली आग ठंडी भी नहीं हो पाती थी कि उसी आग से रात का चूल्हा जल जाता था । बड़ी पतीली में दाल, बड़े भगौने में चावल, कढ़ाई में तरकारी सब ऐसे अनुपात में कि मजाल है कि कोई भूखा रह जाए और ये भी नहीं कि सब बहुत इफरात में बनता था। कभी-कभी कुछ कम भी पड़ जाता था। लेकिन मन में एक दूसरे के प्रति प्रेम था, जगह थी तो कभी कमी पता ही नहीं चली। फल तो यदा कदा आते थे। दादी खरबूजा काटती थीं तो एक-एक फांक सबको पडती थी। आम काटती थीं तो कहती थीं कि दो फांक लोगे या गुठली ?परन्तु उस गुठली या फांको में जो मिठास थी वो अब किलो भर आम या पूरे खरबूजे में कहाँ ? वो मिठास तो सन्तुष्टि की थी आम या खरबूजे की नहीं । जो प्रेम संयुक्त परिवार में था वो अब एकल परिवार में  कहाँ ?

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कहते हैं कि गुरू की कृपा जिस पर हो जाए, उसका जीवन सफल हो जाता है। और यह सत्य भी है। मेरे ऊपर भी ये कृपा हुई थी, जब मुझे एक झन्नाटेदार थप्पड़ का प्रसाद मिला था।
मै संगीत विषय में परास्नातक कर रही थी गुरू जी मुझे घर पर सिखाने आते थे। पूरे वर्ष मुझसे कड़ी मेहनत करवाते। सच कहूं तो मुझसे अधिक मेहनत वे ही करते थे। कहते थे जितना अधिक रियाज़ करोगी, परिणाम उतने ही अच्छे होंगे। यू0 टी0 डब्ल्यू0 572 नं0 की अपनी लूना गाड़ी से चलते थे। हमारे यहाँ आने का उनका कोई समय नहीं होता। जब समय मिलता आ जाते। चाहें दोपहर हो या रात के 8-9 बजे हों लेकिन आते अवश्य थे ! बहुत सरल और सहज स्वभाव के थे। रियाज़ न करने पर ही नाराज़ होते थे।
अतः छः से आठ घंटे तक रियाज़ करना आदत सी बन गई थी और आवश्यकता भी! ये मेरा सौभाग्य ही था कि मैं गुरू के अधिक निकट रही। कहते भी हैं कि जो जितना गुरू के अधिक निकट रहता है, मतलब कला के निकट रहता है। एक-एक राग में पन्द्रह-बीस दिन आराम से लग जाते थे, तब कहीं राग पर पकड़ बन पाती थी, दादरा और ठुमरी के तो कहने ही क्या? कितने मनोयोग से सिखाते थे। कहते थे जो मैं गाऊ वो तो गाओ ही, साथ-साथ अपने मन से भी राग की प्रकृति की जो मांग है, उसके अनुरूप अपने भाव प्रकट करो। भावाभिव्यक्ति बोल-बनाव, तिरोभाव, आविर्भाव, तथा तरह-तरह की लयकारियां आदि सब सिखा कर मेरे गायन में सम्पूर्णता लाना चाहते थे। वो भारतीय संगीत , जिसके अन्तर्गत कल्पना का इतना ऊंचा एवं विस्तृत आकाश है, जहाँ हम नियमों में रहकर विचरण करके भी कितने स्वतंत्र है! काश मैं उन्हें बता पाती कि इस बात का अहसास, इसकी जिम्मेदारी मैं आज कितनी शिद्दत से महसूस करती हूँ। हाँ इस बात का दुख अवश्य है कि  वो हाथ आज मेरे सिर पर नहीं है परन्तु उस हाथ का आशीर्वाद सदैव मैं अपने एक-एक सुर-लय में महसूस करती हूँ।
लेकिन वो समय, वो उम्र  इतनी ज़िम्मेदारी की तो थी नहीं। लापरवाही भी शायद जीवन का एक स्वाभाविक अंग रहती हैं, जो मेरे साथ भी थी। उसी समय हमारी बड़ी बहिन की शादी भी पड़ गई थी। शादी के लगभग सप्ताह भर बाद ही हमारी संगीत की मुख्य प्रायोगिक परीक्षा थी। गुरू जी से शादी  के पूर्व लगभग एक सप्ताह की छुट्टी मिल गई थी इस हिदायत के साथ कि रियाज़ प्रतिदिन करना है, चाहें वो एक-दो घंटे ही क्यूं न हो । और महिला संगीत में तुम्हें गाना नहीं गाना है। क्योकिं गला बैठ गया या आवाज़ फट गई तो प्रैक्टिकल में दिक्कत  हो जायगी और जो क्लास में पोजीशन है उस पर असर पडे़गा। मैंने उनसे तो कह दिया मैं ध्यान रखूंगी। गुरू जी तो आदेश देकर चले गए। अब मैंने सोचा ये तो आठ-दस दिन बाद आयेंगे। इनको कैसे पता चलेगा कि मैंने महिला-संगीत में गाने गाए थे। मैंने खूब धमाल मचाया। गाया भी नाची भी। शादी भर खूब चहकती रही। परन्तु दीदी की विदा होते-होते मेरी आवाज़ ही गायब हो गई ।
अब मैं परेशान। शादी से जितनी खुश थी, उतना ही उनका सामना करने से डर रही थी। खैर! जैसे तैसे गुनगुने पानी से गरारे कर-कर के कुछ आवाज़ वापस आई । तब तक गुरू जी के आने का समय भी नज़दीक आ गया था। हमारी बैठक की खिड़की से सामने पूरी गली दिखाई देती थी। और सामने ही यू0 टी0 डब्ल्यू0 572 को आते देख कर मेरा गला और सूखने लगा।
घर में अभी भी कुछ मेहमान रूके हुए थे अतः दुमंजले पर मैंने एक कमरे में सीखने की व्यवस्था कर रखी थी। गुरू जी को ऊपर कमरे मे लेकर गई । चटाई बिछाई । बोले, तानपुरा मिलाओ। मैंने तानपुरा मिलाया और उन्होंने तबला। बोले, हां शुरू करो। मैंने सुर लगाकर आलाप शुरू ही किया था कि एक जोरदार झापड़ से मैं तिलमिला गई। गुस्से मे बोले , मैं जानता था तुम यही करोगी इसीलिए पहले से मना किया था। पूरे साल की मेहनत पर पानी फेर दिया। इस अप्रत्याशित थप्पड़ से मेरे तो आंसुओं की झरी लग गई । लेकिन उनका, गुस्सा चरम पर था। मेरे पिताजी को बुलाकर कहा, अब मैं इसको नहीं सिखाऊंगा। अभी तो उसी झापड़ की झनझनाहट से ही नहीं उबर पाई थी कि पिताजी की डांट ने आग में घी का काम कर दिया। पिताजी भी बराबर उन्हीं की तरफ से बोल रहे थे, खैर! गल्ती तो मैंने की ही थी। मेरे माफ़ी मांगने पर किसी तरह उनका गुस्सा शान्त हुआ। और स्थिति सामान्य हुई ।
आज जब-जब मैं राग चन्द्रकौंस जो मेरा उस समय पसन्दीदा मंच-प्रदर्शन का राग था, सिखाती हूँ तो वो वाक्या एक रील की तरह घूम जाता है और गुरू कृपा के रूप में एक थप्पड़ का प्रसाद जीवन को किस प्रकार रागमय कर जाता हैं, सोचती हूँ तो धन्य हो जाती हूँ।

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