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Archive for July, 2009

परिवार के सदस्य न होते हुए भी कुछ लोग कितने अपने होते थे। लगता ही नहीं था कि ये परिवार के नहीं हैं। इतना सम्मान व इतनी इज़्ज़त जो उन्हें दी जाती थी। और वे भी तो उसी  तरह बराबर से संबंधो का निर्वाह करते थे। उनमें से एक थीं परमट वाली बहू। सांवला रंग, पान  खाए लाल-लाल होंठ और खिला-खिला सा चेहरा। हाथ में झोला जिसमें चूना और तम्बाकू की डिबिया लिए हर दूसरे तीसरे दिन घर आ जाती थीं। कभी-कभी साथ में उनका लड़का मुनुआ भी आता था। आते ही वो हमारी दादी के पैर छूतीं और  हमारी मां व चाचियां उनके पैर छूतीं। सारे दिन कुछ न कुछ करती रहती कभी-कभी रात में रूक भी जाती थीं। मुझे नहीं मालूम वो किस जाति की थीं, पर मैंने उन्हें हमारे घर में सभी काम करते देखा। कभी तेल लगातीं, कभी बर्तन धोतीं, कभी गेंहू बनातीं, कभी रोटी बनातीं और कभी-कभी तो घर में प्रसव करवाने में भी हाथ बंटातीं। सर्वांगीण व्यक्तित्व की धनी कितनी महत्वपूर्ण थीं बहू। हमने उनको कभी चारपाई पर बैठे नहीं देखा। दादी के पास ज़मीन पर चटाई या बोरा बिछाकर बैठतीं और थोड़ी-थोड़ी देर में दादी को पान बनाकर खिलातीं। और दादी भी हमारी मां से कहती रहतीं अरे बडी दुल्हैन देखो बहू ने खाना खाया या पान मंगवाना तो बहू के लिए भी एक गड्डी मंगवा देना, ले जाएगी। दोनों का एक दूसरे के प्रति स्नेह व सम्मान अपनत्व की मिसाल था।
दूसरी थी चुन्नीगंज वाली महाराजिन । छोटा कद उस पर भी थोड़ी झुकी हुई , उम्रदराज़। वो भी अक्सर हमारे घर आती थीं। दादी उनके पैर छूती थीं, इतनी उम्र होने पर भी वो जब आतीं  खाना बनाकर जातीं और जब जातीं तो उनको भी खाना खिलाकर व साथ में ’सीधा’ बांधकर  दिया जाता तथा कोई न कोई उनको घर छोडने जाता। वो चुन्नीगंज में विक्टोरिया मिल के आखिरी वाले क्वार्टर में रहती थीं। हमें अच्छी तरह से याद है दादी के साथ कभी-कभी हम लोग उनके क्वार्टर पर जाते थे। बडे़ प्यार से चूल्हे की मोटी-मोटी रोटी व सिल पर खड़े नमक, खड़ी लाल मिर्च व सूखी धनिया की ताजी पिसी चटनी खिलातीं, उस प्यार का स्वाद ही निराला था।
और तीसरे थे हमारे प्यारे रामानुज चाचा। चेहरे से ही बहुत शान्त व सौम्य । वो हमें बहुत प्यार करते थे। वैसे थे तो वो हमारे चाचा के दोस्त पर घर के अहम सदस्य थे। हमारे घर में उनकी राय का महत्व व असर होता था। क्योंकि वो जब घर आते थे तो सिर्फ चाचा से ही मिलने नहीं, वाकई में घर आते थे। सबका हालचाल लेते और सबका ख्याल रखते थे। कभी-कभी बाउजी की चिलम तथा हुक्के की तम्बाकू भी लाते मैंने उन्हें देखा है। बड़े दद्दा यानि हमारे पिताजी व हमारी मां को बिल्कुल सगे भाई व भाभी का सम्मान देते थे। वैसे कभी-कभी हमारी मां से मजाक भी कर लिया करते थे। कुछ ही लोग होते हैं जिनकी घर के अन्दर ही नहीं दिलों तक पहुँच होती है उनमें से ही एक थे हमारे रामानुज चाचा।
आज जाने क्यूँ ये चेहरे बार-बार सामने आ रहे हैं, जो कितने अपने थे, कितना अपनापन था इनमें। कोई मुखौटा नहीं, खालिस अपना चेहरा। सोचती हूँ……. ये चेहरे आज कहां गुम हो गए हैं। जहाँ देखो वहाँ मुखौटे ही मुखौटे हैं। चलो ढूंढती हूँ इन्हीं मुखौटों मे शायद कोई मिल जाए जिसे मैं कह सकूँ ये कितने अपने हैं।

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उत्सव जीवन के अंग हुआ करते है । किसी न किसी बहाने हम उत्सव मनाते रहते हैं इससे हमारा मनोरंजन भी होता है। और साथ ही साथ हम समाज से परम्परा से जुडे़ भी रहते हैं । परन्तु उत्सव मनाने का बिल्कुल नया पहलू देखने को तब मिला जब हमारे ही पड़ोस में पीपल की शादी हुई । दो पीपल एक सूत्र में बंध रहे थे इस अवसर पर नाच-गाना व खाना-पीना हो रहा था। उस पीपल-जोडे़ के नीचे दो-तीन पहाड़ी परिवार रहते थे। न जाने उनको क्या सूझी कि पीपल के वृक्ष के विवाह का आयोजन कर डाला। पूरे विधि-विधान से विवाह हुआ। फिर सारी रात कच्ची मदिरा के मद मे चूर नाच-गाने मे मशगूल रहे।
सुबह सब शान्त था। विदाई का दिन था पर किसकी विदाई ? तभी देखा कि पास ही बनी कच्ची झोपड़ी की चैखट पर बैठी जवान कमला सिसकियां भर रही थी। अन्दर टूटी खाट पर बूढ़ा बाप खांस रहा था। मां को मरे कई वर्ष हो गए थे। झूठे बर्तन धोकर किसी तरह कमला दवा करा रही थी और सोच रही थी कि काश वो पीपल होती !

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