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Archive for August, 2009

बचपन के सच बचपन की तरह कितने कोमल और सहज होते हैं । कभी चांद को आंगन  में उतार लाने की हठ का सच! कभी आंगन में फुदकती गौरैया को पकड़ने की अजानी कोशिश का सच और कभी झाड़ू की सींक से बनाए गुड़िया के स्वेटर बुनने का सच!
याद आती है वो पुराने स्वेटरों की उधड़ी पुरानी रंग-बिरंगी ऊन और नारियल की झाड़ू की सींकें। जिनसे स्वेटर बुनना सिखाया जाता था। हां गुड़िया का स्वेटर पूरा होते-होते चार-छैः सींके तो टूटना आम बात थी लेकिन स्वेटर पूरा हो जाता था। उस रंग-बिरंगे स्वेटर में गुड़िया कितनी सुन्दर लगती थी।
कितनी कहानियां याद आती हैं आज मुझे! जो चूल्हे पर रोटी सेंकते हुए हमारी दादी हमें पास बिठाकर सुनाती थीं। कभी राजा दशरथ व उनकी रानियों की , कभी राजा हरिश्चन्द्र की, सत्यवान-सावित्री की, जीजाबाई-शिवाजी की और न जाने कितनी प्रेरणादायक कहानियाँ।
करवा चैथ के 10-15 दिन पहले से ही आंगन की एक दीवार पर करीब 6×4 में करवा चौथ लिखनी शुरू हो जाती थी। पहले गोबर से दीवार को लीपा जाता फिर शहतूत की पत्ती रगड़कर चिकना कर कोयले से पूरा स्थान काला किया जाता और तब ऐपन से लिखी जाती करवा चौथ। काले पर सफेद ऐपन खूब खिलकर आता। उस स्थान के केन्द्र में करवा चौथ की पुतली के अलावा न जाने कितनी चित्रकारी उसमें होती। चांद-सूरज, गणेश-लक्ष्मी, चार डुकरिया – (भूख, प्यास, नींद, आस) देवी के पांव, सतिया (स्वास्तिक), सीढ़ी, अध्र्य देती स्त्री, छोटी-छोटी चिड़ियाँ और न जाने क्या-क्या। हम बच्चों से तो किनारी (बार्डर) बनवाई जाती तथा खाली जगह में छोटी-छोटी कलाकृतियां।
चैत और क्वांर की नवरात्रि में परवा व अष्टमी वाले दिन देवी जी के सामने अज्ञारी (अग्नि) जलाई जाती थी। हलुआ और पूड़ी (अठवाईं) का भोग लगता था। और जब तक अज्ञारी में लौ जलती रहती देवी गीत गाए जाते। हम सभी साथ-साथ गाते और लौ शान्त होने पर ही हाथ जोड़ कर उठते।
इसी तरह होली पर बाहर होलिका से लाई गई अग्नि से घर की होली जलती और जब तक अग्नि प्रज्जवलित रहतीं हम सभी मिलकर होली गीत गाते।
सावन में बारिश की झड़ी लगते ही नीम पर पड़े झूले पर झूलते हुए दादी के सिखाए सावन गीत गाते और तब तक झूला नहीं छोडते जब तक वो सारे गीत नहीं गा लेते।
बचपन से ही हमारी रंगांे-चित्रों, शब्दों व सुरों से जान-पहचान रही है। दादी ने व हमारी मां ने जाने-अन्जाने में ही हमें कथा-कहानियों के माध्यम से साहित्य से, करवाचैथ आदि के     माध्यम से कला एवं परम्पराओं से तथा नवरात्रि, होली व सावन आदि के माध्यम से संगीत से यानि साहित्य, कला, संगीत अर्थात् सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति से ही परिचित करा दिया।
वो अंकुर , वो पौध आज पुष्पित, पल्लवित और फलित है। आज वो सच स्मृति शेष नहीं, रेत पे लकीर नहीं, बल्कि लौह पे लकीर सम संस्कारित हो गए हैं। ये आज जान पाईं हूँ और ये भी कि वो सच कितने सच्चे हैं।

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