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Archive for March, 2010

सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय  मनरेगा…….

मनरेगा का धन ग़रीबों के पेट में नहीं माननीयों की तिजोरी में ‘

मजदूरों के बजाय जे सी बी मशीनों से नहरों की भराई करा श्रमदान घोषित ‘

और आप कहते हैं मन……रे…….गा…….

कैसे सम्भव है?

वीणा

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एक छोटी सी बच्ची को सिर पर

गोबर से भरी डलिया लिए हुए

जब मैंने देखा ‘ मैं तब नहीं चौंकी

चौंकी तब …जब मैंने उसे एक स्कूल के सामने

अन्दर पढ़ते हुए बच्चों को

एकटक निहारते हुए पाया

हांलाकि उसकी पीठ जरूर मेरी ओर थी

लेकिन मैं……

उसके चेहरें के एक एक भाव पढ़ रही थी

वो देख रही थी पढ़ते बच्चों को

और खुश हो रही थी

वो सोच नहीं रही थी ‘कि

काश मैं भी पढ़ती होती ‘ क्योंकि

उसकी उम्र सोचने की  भी नहीं थी

और ………

जिनकी उम्र सोचने की  थी

उन्हें पेट भरने की चिंता

कुछ और सोचने भी नहीं देती

जब-तब ‘कभी कुछ सोचने की कोशिश करते

पेट फिर से खाली हो जाता.

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पश्चिम की आंधी में देशी बच्चे बहने आज लगे हैं

साठ लाख का बुरा है क्या ये पैकेज  कहने आज लगे हैं

लैपटॉप मोबाइल इन्टरनेट ही अब इनकी दुनियाँ है

गूगल याहू डॉट कॉम के घर में रहने आज लगे हैं

बुलंदियां छू रहे हो तुम जिन बुनियादों पर खड़े हुए हो

मुड़कर तो देखो वो खण्डहर ढहने आज लगे हैं.

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नारी जीवन आज तुम्हारे यही मायने

पंख लगाकर खुले गगन में उड़ी उड़ानें

आसमान हो, अंतरिक्ष या पार क्षितिज के

अब सब लगते घर जैसे जाने पहचाने

नारी हो नर से आगे या नर नारी से आगे

कोई फरक नहीं पड़ता जो टूट न पायें धागे

आसमान विस्तृत सागर सी जब सोच हमारी होगी

तब लहराएगा परचम दुनियाँ में सबसे आगे

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कृष्ण होली खेलने के लिए गलियों में निकलते हैं उन्हें देखते ही सारी गोपियाँ छुप जाती हैं लेकिन तभी एक कमसिन गोपी उनके हाँथ आ जाती है और वो उसी से होली खेलने लगते हैं. तो वह गोपी क्या कहती है…

बारी उमरिया है मोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

रंग नहीं आवै ढंग नहीं आवे

आवै न मोहे जोरा जोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

तोरे लाने मैं ल्याऊँ दई माखन

करनै परै न तोए चोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

लेकिन कृष्ण नहीं मानते हैं अंत में परेशान होकर वो गोपी कहती है ….

जो तुम मोरी एकऊ न मानों

तो, होरी में जाये ऐसी होरी

आओ कान्हा खेलूं मैं होरी

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