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Archive for April, 2010

बाउजी

बाउजी,हम सबके बाउजी

बैठक मैं बैठे

हुक्का पीते बाउजी

शतरंज खेलते बाउजी

कभी न हारे बाउजी

शेर कहते बाउजी

नज़्म लिखते बाउजी

ग़ज़लें जब उनकी तरन्नुम में गाती

पाँच का सिक्का ईनाम देते बाउजी

बीड़ी के बण्डल से जब कूपन चुराती

जाने कैसे जान लेते बाउजी

पाई-पाई का हिसाब रखते बाउजी

आगे छड़ी पीछे चलते बाउजी

जाने कब सीढ़ी से फिसल गए बाउजी

जीती बाज़ी हार गए बाउजी

टूट गए बाउजी

रूठ गए बाउजी .

वीणा

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जब -जब मैं छत पर आती

बादलों में छुप जाता था  चाँद

ऐसा तुम कहते थे …….

जब-जब मैं हँसती-खिलखिलाती

तब-तब आँगन में झरता हरसिंगार

ऐसा तुम कहते थे …….

जब-जब मैं मायूस होती

पत्तों से झरती ओस

ऐसा तुम कहते थे …….

पर\ जब मैंने कुछ कहना चाहा

तुमने रख दी हथेली अधरों पर

और मैं………….

सिर्फ सुनती रही

साँसों की सरगम .

वीणा

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पौध ……

बेरोजगारों की पौध तैयार कर रहे हैं अधिकांश स्ववित्त-पोषित महाविद्यालय ……..नक़ल करा के दुकान तो चलाई जा सकती है परन्तु योग्य पौध तो योग्य शिक्षक ही शिक्षा के मंदिर में तैयार कर सकता है .बच्चों के भविष्य के प्रति हम शिक्षकों को अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी .

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माँ, मेरी माँ,जिसके आंसुओं से लिखी है इबारत मैंने

गुब्बारे सा  फूटा था गुबार ,

रोती रही थी अनवरत

धीरे-धीरे ….जी हल्का हुआ

सिसकियों के बीच

डबडबाते आंसुओं और थरथराते अधरों से

बही थी वेदना….

ढाढस ने तोड़ा था बाँध ,

बौनी हो गई थी संवेदना

परम्पराओं के मजबूत धागे में बंधी पीढ़ियाँ

दिल और दिमाग पर हावी थीं रूढ़ियाँ

मैं तीन की  ,माँ तेईस की

तिस पर फिर से भारी पाँव

बेटा जो जनना था……

सन इकसठ कि कड़कड़ाती ठण्ड में

दो बेटियों पर जना था बेटा ,मेरी माँ ने

बजने लगी थीं थालियाँ

घर आँगन क्या मोहल्ले में दौड़ गई थी खबर ,

बिजली…………सी

पहला पोता जो था ,

हाड़ कँपाने वाली ठण्ड

इतनी कि बड़े-बूढों के भी बर्दाश्त के बाहर

फिर एक नन्ही सी जान……..?

नलों में पानी तक जम गया था ,

पानी क्या ….खून भी जम गया था ,अगली सुबह

जब चीख पड़ी थी माँ

थम गईं थीं साँसें ,बर्फ हो गई थी जान

फट गई थी धरती ,गिर पड़ाथा आसमान

नहीं रहा नवजात ……..

नि:शब्द ,निस्तेज , निष्प्राण,

काठ की  हो गई थी माँ

पागल …..पूरी पागल …..कहने लगे थे लोग

शुरू हो गई थी झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र

घर आने लगे थे तांत्रिक ……ओझा …..

सताई जाने लगी थी माँ

क्यूँ नहीं समझ पाए ,लोग…..

कोख-जाए  के बिछोह का दर्द जब फूटता है तो ..

क्षत- विक्षत कर देता है ,और…….

जब धीरज टूटता है ,तो टूट जाते हैं बाँध ,रोके नहीं रुकता है सैलाब

क्षीण से क्षीणतर होतिहोती गई माँ

चक्कर खाकर गिर-गिर पड़ती माँ

बीमारी ने आज तक दामन नहीं छोड़ा है

उसके चेहरे की हड्डियां तो मेरे बच्चे भी गिन लेते हैं

……………कुछ दिनों से देख रही हूँ

माँ की गर्दन स्थिर नहीं रहती ,

कुछ-कुछ देर में हिलने लगती है ….

लेकिन माँ कितनी स्थिर है

आज भी ………

अपनी पीड़ाओं के प्रति निर्लिप्त ,निस्संग

अपने ही बच्चों की चिंता में निमग्न ,

लड़ रही है अपने शरीर से ……

जिसके ऊपर कभी रूढ़ियाँ हावी थीं

और आज उम्र …….

मैं तब भी कुछ नहीं कर पाई

और आज भी     \

डा.वीणा श्रीवास्तव

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