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Archive for May, 2010

आओ चलो बोएं

संवेदना के बीज

खेतों में नहीं

पगडंडियों के किनारे,बगीचों में ….

जहाँ सैर करने निकलते हैं लोग सुबह-शाम

और सबसे पहले तो अपने-अपने आँगन में लगी

तुलसी के घरुए में

अंकुरण से फैलेगी वो खुशबु, वो महक

जो दिल ओ दिमाग के पर्यावरण को

रखेगी मुक्त प्रदूषण से से,

संवेदनाओं के सूखे से

स्वस्थ मन – मस्तिष्क में

लहलहाएगी फसल

प्रेम,स्नेह ,त्याग और समर्पण की

तब कह सकेंगे दावे से

हाँ ,हम इंसान हैं.

वीणा

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