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Archive for May, 2011

‘बचपन ‘

कचरे के ढेर पर बचपन तलाशते हुए

बचपन को देखा है

कभी पॉलीथीन के आइने में

उन्नींदें चेहरे में जगती उम्मीदें

या/मैले-कुचैले कागज़ों में लिखी

अपनी जिंदगी की इबारत

क्या ढूंढते हैं ये ?

कभी सोचती हूँ

ये कैसे नौनिहाल हैं

जो भूख से बेहाल हैं

या/कभी न हल होने वाले

अनुत्तरित सवाल हैं?

सुबह से शाम इनका कंधा

कचरा ढोकर लाता है

कचरे में ढूंढते-ढूंढते जिंदगी

इनका बचपन खो जाता है.

वीणा .

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कोई इम्तिहान नहीं दे रही

फिर भी चल रही हूँ अंगारों पर नंगे पैर

आखिर क्यूँ?

क्यूँ सज़ा काट रही हूँ

किसी खता की,

जो मैंने की ही नहीं

आखिर क्यूँ?

क्यूँ छलक पड़ते हैं आंसू

बात-बात पर

जिनसे कोई वास्ता नहीं

आखिर क्यूँ?

क्यूँ नहीं आती नींद

रात-रात भर

करवटें बदलती रहती हूँ बिना आहट के

ताकि चैन से सो सके

बाजू  में  सोई , थकी -हारी रात

सुबह उठते ही

डांटती हैं सलवटें मुझे ही

आखिर क्यूँ?

पता है क्यूँ ?

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