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Archive for the ‘Geet’ Category

कृष्ण होली खेलने के लिए गलियों में निकलते हैं उन्हें देखते ही सारी गोपियाँ छुप जाती हैं लेकिन तभी एक कमसिन गोपी उनके हाँथ आ जाती है और वो उसी से होली खेलने लगते हैं. तो वह गोपी क्या कहती है…

बारी उमरिया है मोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

रंग नहीं आवै ढंग नहीं आवे

आवै न मोहे जोरा जोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

तोरे लाने मैं ल्याऊँ दई माखन

करनै परै न तोए चोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

लेकिन कृष्ण नहीं मानते हैं अंत में परेशान होकर वो गोपी कहती है ….

जो तुम मोरी एकऊ न मानों

तो, होरी में जाये ऐसी होरी

आओ कान्हा खेलूं मैं होरी

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वर दे मात शारदे वर दे
 वाणी में रस भर दे
 जब चाहे तू जैसा चाहे
 वैसा ही मन कर दे
   है तुझ पर सर्वस्व निछावर
   विद्या बुद्धि प्रखर दे
     दीप जलें खुशियों के घर-घर
     वरद हस्त तू धर दे
   जैसी तेरी बजती ’वीणा’
   वैसी सबकी कर दे

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