Feeds:
Posts
Comments

Archive for the ‘Home’ Category

‘बचपन ‘

कचरे के ढेर पर बचपन तलाशते हुए

बचपन को देखा है

कभी पॉलीथीन के आइने में

उन्नींदें चेहरे में जगती उम्मीदें

या/मैले-कुचैले कागज़ों में लिखी

अपनी जिंदगी की इबारत

क्या ढूंढते हैं ये ?

कभी सोचती हूँ

ये कैसे नौनिहाल हैं

जो भूख से बेहाल हैं

या/कभी न हल होने वाले

अनुत्तरित सवाल हैं?

सुबह से शाम इनका कंधा

कचरा ढोकर लाता है

कचरे में ढूंढते-ढूंढते जिंदगी

इनका बचपन खो जाता है.

वीणा .

Advertisements

Read Full Post »

कोई इम्तिहान नहीं दे रही

फिर भी चल रही हूँ अंगारों पर नंगे पैर

आखिर क्यूँ?

क्यूँ सज़ा काट रही हूँ

किसी खता की,

जो मैंने की ही नहीं

आखिर क्यूँ?

क्यूँ छलक पड़ते हैं आंसू

बात-बात पर

जिनसे कोई वास्ता नहीं

आखिर क्यूँ?

क्यूँ नहीं आती नींद

रात-रात भर

करवटें बदलती रहती हूँ बिना आहट के

ताकि चैन से सो सके

बाजू  में  सोई , थकी -हारी रात

सुबह उठते ही

डांटती हैं सलवटें मुझे ही

आखिर क्यूँ?

पता है क्यूँ ?

Read Full Post »

वह बोला

मेरे खेतों में सोना है

मैं हँसी ये सोच कर कि

यह अक्ल से कितना बौना है

सोना होता,तो क्या इसके कपड़ों में

पैबन्द होता ?

वह भी तुरंत मुस्कराया

और बोला …….बहन जी ,

खेतों में नीचे का सोना तो सरकार का है

ऊपर धनवान का है

मुझे तो अपना सोच कर

सन्तुष्ट होना है

और रही पैबन्द की बात,

तो ये पैबन्द अब कपड़ों पर नहीं

बदन पर चिपके से लगते हैं

पर मैं सन्तुष्ट हूँ

कम से कम

इज्ज़त तो ढांके हैं .

वीणा

Read Full Post »

तुम नदी हो

बहो…….

बहना तो प्रकृति है

और तुम्हारी नियति भी

जो चाहो बहा कर ले जाओ

तिनका हो या काठ

मर्ज़ी तुम्हारी

तुम्हारा वेग तुम्हारा सम्बल है

और,अपने प्रिय सागर से

मिलने की आकुलता भी

इसी आकुलता ने

न जाने कितने पत्थर तराशे

और न जाने

कितने पत्थरों के बीच से

रास्ता तय किया

पर, भाग्य या दुर्भाग्य उन पत्थरों का

उनमें से कुछ तो शिवलिंग बन गए

और कुछ …

निरे पत्थर के पत्थर .

डा.वीणा

Read Full Post »

आओ चलो बोएं

संवेदना के बीज

खेतों में नहीं

पगडंडियों के किनारे,बगीचों में ….

जहाँ सैर करने निकलते हैं लोग सुबह-शाम

और सबसे पहले तो अपने-अपने आँगन में लगी

तुलसी के घरुए में

अंकुरण से फैलेगी वो खुशबु, वो महक

जो दिल ओ दिमाग के पर्यावरण को

रखेगी मुक्त प्रदूषण से से,

संवेदनाओं के सूखे से

स्वस्थ मन – मस्तिष्क में

लहलहाएगी फसल

प्रेम,स्नेह ,त्याग और समर्पण की

तब कह सकेंगे दावे से

हाँ ,हम इंसान हैं.

वीणा

Read Full Post »

बाउजी

बाउजी,हम सबके बाउजी

बैठक मैं बैठे

हुक्का पीते बाउजी

शतरंज खेलते बाउजी

कभी न हारे बाउजी

शेर कहते बाउजी

नज़्म लिखते बाउजी

ग़ज़लें जब उनकी तरन्नुम में गाती

पाँच का सिक्का ईनाम देते बाउजी

बीड़ी के बण्डल से जब कूपन चुराती

जाने कैसे जान लेते बाउजी

पाई-पाई का हिसाब रखते बाउजी

आगे छड़ी पीछे चलते बाउजी

जाने कब सीढ़ी से फिसल गए बाउजी

जीती बाज़ी हार गए बाउजी

टूट गए बाउजी

रूठ गए बाउजी .

वीणा

Read Full Post »

जब -जब मैं छत पर आती

बादलों में छुप जाता था  चाँद

ऐसा तुम कहते थे …….

जब-जब मैं हँसती-खिलखिलाती

तब-तब आँगन में झरता हरसिंगार

ऐसा तुम कहते थे …….

जब-जब मैं मायूस होती

पत्तों से झरती ओस

ऐसा तुम कहते थे …….

पर\ जब मैंने कुछ कहना चाहा

तुमने रख दी हथेली अधरों पर

और मैं………….

सिर्फ सुनती रही

साँसों की सरगम .

वीणा

Read Full Post »

Older Posts »