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Archive for the ‘Introduction’ Category

भूमिका!

 

कितने प्रतिमान गढे गए जीवन के. सभी की अपनी अपनी दृष्टि और उपादेयता भी सिद्ध हुई हैं. परन्तु मुझे ‘सागर’ सा विस्तृत, गहरा जीवनदायी प्रतिमान ‘सागर’ ही अधिक उपयुक्त लगा. हम अपनी भावनओं के सागर में जितना चाहे उतना गहरे उतर सकते हैं. गहराई में गोते लगते हुए, सागर-मंथन कर उसमे से रतन रुपी शब्द अर्थ व भावो की गेहेंता को धरातल पर लाकर जीवन के सागर से जोड़ लेते हैं. लहरें भावोद्रेक में जब जब तट से तक्त्रती हैं, तब तब न जाने क्या क्या कह जाती हैं. सर्जनात्मक चेतना सृजन में पर्यनत हो क्षितिज के द्वार भी खोल देती है और तब जीवन के एक एक पृष्ठ स्वयं बोल उठते हैं और कहने लगते हैं वो सब कुछ, जो सहज कहना संभव नहीं होता. वो तो बस लेहेरों की तरह आता है और पृष्ठ भावों से भीग जाते हैं. लेहेरों के जाने पर शब्द अंकित हो जाते हैं और छोड़ जाते हैं आपके मनस पर वे शब्द-चित्र, जो आपके अपने आप बीते से लगते हैं.

बचपन से अब तक की स्मृतियाँ कुछ इस कदर विचलित कर रहीं हैं की पूछिए मत. कई बार ऐसा लगा जैसे कह रहीं हो की मुझे लिखो. अब बताइए मैं उनका कहा कैसे ताल सकती थी. बस फिर क्या था मन सागर हुआ लहरें आती गयी और हर बार तट पर कुछ न कुछ छोड़ गयी कभी सीप कभी शंख. मैं उन सीपों को सहेजती गयी और उनमे से एक एक मोती चुन चुन कर उन मोतियों को जीवन की यथार्थ की माला में पिरो दिया. अब इसी माला को आपके सामने रखने का साहस कर रही हूँ.
ये स्मृतियाँ बचपन की हैं, घर मोहल्ले की हैं, इर्द गिर्द घूमती, घटती घटनाओं की हैं. पर्त दर पर्त खुलती स्मृतियाँ कैसे कागज़ पर उतर आती हैं और प् लेती हैं एक मुकम्मल आकर. चाहे वो डायरी के रूप में हो या पुस्तक के रूप में. इन स्मृतियों को जब तब जो पढता है वो उसे अपनी आप बीती लगती है. ऐसा मुझे लगता है क्योंकि कोई उसमे अपना खोया हुआ प्यार ढूंढ लेता है, कोई संयुन्क्त परिवार का प्रेम, कोई संसार तो कोई दर्द. सब की अपनी अपनी दृष्टि है, अपनी अपनी कसक. मैंने तो जो जिया लिख दिया.

मैं आप सभी का मेरे इस रचना संसार में स्वागत करती हूँ. आशा है आपको मेरी यह रचनाएँ पसंद आएँगी. धन्यवाद् !


वीणा

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