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Archive for the ‘Katha Sansmaran’ Category

बचपन के सच बचपन की तरह कितने कोमल और सहज होते हैं । कभी चांद को आंगन  में उतार लाने की हठ का सच! कभी आंगन में फुदकती गौरैया को पकड़ने की अजानी कोशिश का सच और कभी झाड़ू की सींक से बनाए गुड़िया के स्वेटर बुनने का सच!
याद आती है वो पुराने स्वेटरों की उधड़ी पुरानी रंग-बिरंगी ऊन और नारियल की झाड़ू की सींकें। जिनसे स्वेटर बुनना सिखाया जाता था। हां गुड़िया का स्वेटर पूरा होते-होते चार-छैः सींके तो टूटना आम बात थी लेकिन स्वेटर पूरा हो जाता था। उस रंग-बिरंगे स्वेटर में गुड़िया कितनी सुन्दर लगती थी।
कितनी कहानियां याद आती हैं आज मुझे! जो चूल्हे पर रोटी सेंकते हुए हमारी दादी हमें पास बिठाकर सुनाती थीं। कभी राजा दशरथ व उनकी रानियों की , कभी राजा हरिश्चन्द्र की, सत्यवान-सावित्री की, जीजाबाई-शिवाजी की और न जाने कितनी प्रेरणादायक कहानियाँ।
करवा चैथ के 10-15 दिन पहले से ही आंगन की एक दीवार पर करीब 6×4 में करवा चौथ लिखनी शुरू हो जाती थी। पहले गोबर से दीवार को लीपा जाता फिर शहतूत की पत्ती रगड़कर चिकना कर कोयले से पूरा स्थान काला किया जाता और तब ऐपन से लिखी जाती करवा चौथ। काले पर सफेद ऐपन खूब खिलकर आता। उस स्थान के केन्द्र में करवा चौथ की पुतली के अलावा न जाने कितनी चित्रकारी उसमें होती। चांद-सूरज, गणेश-लक्ष्मी, चार डुकरिया – (भूख, प्यास, नींद, आस) देवी के पांव, सतिया (स्वास्तिक), सीढ़ी, अध्र्य देती स्त्री, छोटी-छोटी चिड़ियाँ और न जाने क्या-क्या। हम बच्चों से तो किनारी (बार्डर) बनवाई जाती तथा खाली जगह में छोटी-छोटी कलाकृतियां।
चैत और क्वांर की नवरात्रि में परवा व अष्टमी वाले दिन देवी जी के सामने अज्ञारी (अग्नि) जलाई जाती थी। हलुआ और पूड़ी (अठवाईं) का भोग लगता था। और जब तक अज्ञारी में लौ जलती रहती देवी गीत गाए जाते। हम सभी साथ-साथ गाते और लौ शान्त होने पर ही हाथ जोड़ कर उठते।
इसी तरह होली पर बाहर होलिका से लाई गई अग्नि से घर की होली जलती और जब तक अग्नि प्रज्जवलित रहतीं हम सभी मिलकर होली गीत गाते।
सावन में बारिश की झड़ी लगते ही नीम पर पड़े झूले पर झूलते हुए दादी के सिखाए सावन गीत गाते और तब तक झूला नहीं छोडते जब तक वो सारे गीत नहीं गा लेते।
बचपन से ही हमारी रंगांे-चित्रों, शब्दों व सुरों से जान-पहचान रही है। दादी ने व हमारी मां ने जाने-अन्जाने में ही हमें कथा-कहानियों के माध्यम से साहित्य से, करवाचैथ आदि के     माध्यम से कला एवं परम्पराओं से तथा नवरात्रि, होली व सावन आदि के माध्यम से संगीत से यानि साहित्य, कला, संगीत अर्थात् सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति से ही परिचित करा दिया।
वो अंकुर , वो पौध आज पुष्पित, पल्लवित और फलित है। आज वो सच स्मृति शेष नहीं, रेत पे लकीर नहीं, बल्कि लौह पे लकीर सम संस्कारित हो गए हैं। ये आज जान पाईं हूँ और ये भी कि वो सच कितने सच्चे हैं।

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परिवार के सदस्य न होते हुए भी कुछ लोग कितने अपने होते थे। लगता ही नहीं था कि ये परिवार के नहीं हैं। इतना सम्मान व इतनी इज़्ज़त जो उन्हें दी जाती थी। और वे भी तो उसी  तरह बराबर से संबंधो का निर्वाह करते थे। उनमें से एक थीं परमट वाली बहू। सांवला रंग, पान  खाए लाल-लाल होंठ और खिला-खिला सा चेहरा। हाथ में झोला जिसमें चूना और तम्बाकू की डिबिया लिए हर दूसरे तीसरे दिन घर आ जाती थीं। कभी-कभी साथ में उनका लड़का मुनुआ भी आता था। आते ही वो हमारी दादी के पैर छूतीं और  हमारी मां व चाचियां उनके पैर छूतीं। सारे दिन कुछ न कुछ करती रहती कभी-कभी रात में रूक भी जाती थीं। मुझे नहीं मालूम वो किस जाति की थीं, पर मैंने उन्हें हमारे घर में सभी काम करते देखा। कभी तेल लगातीं, कभी बर्तन धोतीं, कभी गेंहू बनातीं, कभी रोटी बनातीं और कभी-कभी तो घर में प्रसव करवाने में भी हाथ बंटातीं। सर्वांगीण व्यक्तित्व की धनी कितनी महत्वपूर्ण थीं बहू। हमने उनको कभी चारपाई पर बैठे नहीं देखा। दादी के पास ज़मीन पर चटाई या बोरा बिछाकर बैठतीं और थोड़ी-थोड़ी देर में दादी को पान बनाकर खिलातीं। और दादी भी हमारी मां से कहती रहतीं अरे बडी दुल्हैन देखो बहू ने खाना खाया या पान मंगवाना तो बहू के लिए भी एक गड्डी मंगवा देना, ले जाएगी। दोनों का एक दूसरे के प्रति स्नेह व सम्मान अपनत्व की मिसाल था।
दूसरी थी चुन्नीगंज वाली महाराजिन । छोटा कद उस पर भी थोड़ी झुकी हुई , उम्रदराज़। वो भी अक्सर हमारे घर आती थीं। दादी उनके पैर छूती थीं, इतनी उम्र होने पर भी वो जब आतीं  खाना बनाकर जातीं और जब जातीं तो उनको भी खाना खिलाकर व साथ में ’सीधा’ बांधकर  दिया जाता तथा कोई न कोई उनको घर छोडने जाता। वो चुन्नीगंज में विक्टोरिया मिल के आखिरी वाले क्वार्टर में रहती थीं। हमें अच्छी तरह से याद है दादी के साथ कभी-कभी हम लोग उनके क्वार्टर पर जाते थे। बडे़ प्यार से चूल्हे की मोटी-मोटी रोटी व सिल पर खड़े नमक, खड़ी लाल मिर्च व सूखी धनिया की ताजी पिसी चटनी खिलातीं, उस प्यार का स्वाद ही निराला था।
और तीसरे थे हमारे प्यारे रामानुज चाचा। चेहरे से ही बहुत शान्त व सौम्य । वो हमें बहुत प्यार करते थे। वैसे थे तो वो हमारे चाचा के दोस्त पर घर के अहम सदस्य थे। हमारे घर में उनकी राय का महत्व व असर होता था। क्योंकि वो जब घर आते थे तो सिर्फ चाचा से ही मिलने नहीं, वाकई में घर आते थे। सबका हालचाल लेते और सबका ख्याल रखते थे। कभी-कभी बाउजी की चिलम तथा हुक्के की तम्बाकू भी लाते मैंने उन्हें देखा है। बड़े दद्दा यानि हमारे पिताजी व हमारी मां को बिल्कुल सगे भाई व भाभी का सम्मान देते थे। वैसे कभी-कभी हमारी मां से मजाक भी कर लिया करते थे। कुछ ही लोग होते हैं जिनकी घर के अन्दर ही नहीं दिलों तक पहुँच होती है उनमें से ही एक थे हमारे रामानुज चाचा।
आज जाने क्यूँ ये चेहरे बार-बार सामने आ रहे हैं, जो कितने अपने थे, कितना अपनापन था इनमें। कोई मुखौटा नहीं, खालिस अपना चेहरा। सोचती हूँ……. ये चेहरे आज कहां गुम हो गए हैं। जहाँ देखो वहाँ मुखौटे ही मुखौटे हैं। चलो ढूंढती हूँ इन्हीं मुखौटों मे शायद कोई मिल जाए जिसे मैं कह सकूँ ये कितने अपने हैं।

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उत्सव जीवन के अंग हुआ करते है । किसी न किसी बहाने हम उत्सव मनाते रहते हैं इससे हमारा मनोरंजन भी होता है। और साथ ही साथ हम समाज से परम्परा से जुडे़ भी रहते हैं । परन्तु उत्सव मनाने का बिल्कुल नया पहलू देखने को तब मिला जब हमारे ही पड़ोस में पीपल की शादी हुई । दो पीपल एक सूत्र में बंध रहे थे इस अवसर पर नाच-गाना व खाना-पीना हो रहा था। उस पीपल-जोडे़ के नीचे दो-तीन पहाड़ी परिवार रहते थे। न जाने उनको क्या सूझी कि पीपल के वृक्ष के विवाह का आयोजन कर डाला। पूरे विधि-विधान से विवाह हुआ। फिर सारी रात कच्ची मदिरा के मद मे चूर नाच-गाने मे मशगूल रहे।
सुबह सब शान्त था। विदाई का दिन था पर किसकी विदाई ? तभी देखा कि पास ही बनी कच्ची झोपड़ी की चैखट पर बैठी जवान कमला सिसकियां भर रही थी। अन्दर टूटी खाट पर बूढ़ा बाप खांस रहा था। मां को मरे कई वर्ष हो गए थे। झूठे बर्तन धोकर किसी तरह कमला दवा करा रही थी और सोच रही थी कि काश वो पीपल होती !

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शाम को लगभग चार-पांच बजे घंटियों की  आवाज़ सुनते ही गली के लगभग सभी बच्चे चैतन्य हो जाया करते थे। ‘पैवलाव’ के सिद्वान्त सा सौ फीसदी सम्बन्ध घंटी, लार व कुल्फी के बीच जो जुड़ा हुआ था।
अमूमन लोगों को कुल्फी वाले व बाइस्कोप वाले की घंटियों में फर्क नज़र नहीं आता था। पर मैं समझ जाती थी कि ये  कुल्फी वाला है और वो बाइस्कोप वाला। दोनों की घंटियों की ध्वनि में भी अन्तर था और घंटी में बंधी डोरी खीचने की स्टाइल में भी। जिस दिन पास में पैसे होते, इन्तज़ार बहुत खलता। घंटी बजते ही बाहर निकल आती। पांच पैसे मे सादी कुल्फी और दस पैसे में ईनाम वाली। ईनाम वाली कुल्फी में कुल्फी के साथ ही पैसे भी जमे रहते थे। किसी मे दो पैसे, किसी में तीन, किसी मे पांच, किसी मे दस और किसी-किसी में चवन्नी। कुल्फी निकालते समय कभी भगवान का नाम लेती व कभी-कभी दस की उल्टी गिनती गिनकर निकालती।
उस दिन उल्टी गिनती गिनकर पांचवे नं0 की कुल्फी उसके बाॅक्स से निकाली थी, क्योंकि पांच मेरा लकी नं0 था। कुल्फी में जमी चवन्नी देखकर आंखों की चमक दुगुनी व क्षणिक अमीर होने के एहसास से फूल गई थी। ठेले के पास ख़डे अन्य बच्चों के चेहरे देख अपनी जीत दर्शाती धीरे-2 कुल्फी का आनन्द ले रही थी।
इसी बीच बाइस्कोप वाला घंटी बजाता हुआ गली में आया। मन और प्रसन्न हो गया, क्योंकि आज तो पैसे भी बहुत थे। उसके ठेले पर बाइस्कोप तथा उसी के बगल में एक लम्बी लकड़ी की बैंच उल्टी रखी होती थी। वो जहाँ बच्चों की भीड़ देखता, वहीं ठेला रोक कर बैंच उतार देता। हम बच्चे एक दूसरे को धक्का देते हुए बैंच पर अपनी जगह पा लेते। बाइस्कोप में अन्दर देखने के लिए छः छेद होते थे, जिनमें ढक्कन लगे रहते थे। वो जैसे ही ढक्कन हटाता, बच्चे अपना-अपना चेहरा उन छेदों पर फिट कर लेते और दोनो साइड हाथों से बन्द कर लेते। इससे एक तो बाहर की रौशनी अन्दर नहीं आती और दूसरा जो महत्वपूर्ण था कि कोई दूसरा बच्चा साइड से अन्दर झांक न ले।
बाइस्कोप में सबसे पहले रंग बिरंगी टूटी चूडियों की भिन्न-भिन्न कलाकृतियां दिखतीं। कभी गोल, त्रिकोण, चैकोर, व ष्टकोणींय भिन्न-भिन्न आकार के आलेखन दिखाता। इतनी देर में बाकी सैटिंग कर लेता था । बाइस्कोप के ऊपर रखे ग्रामोफोन में रिकार्ड लगाकर गाने बजाता और अन्दर बाइस्कोप मे भिन्न-भिन्न पत्र-पत्रिकाओं से बेतरतीब काटे गए नायक-नायिकाओ के चित्र एक रील में चिपके से चल पड़ते। रिकार्ड में गाना बजता ‘हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपटटा मलमल का’ और कभी ’कजरा मोहब्बत वाला’। गीतों व चित्रों में कोई तारतम्य नहीं होता। भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में मूक चित्र आगे खिसकते जाते और साथ में गीत अपनी अलग धुन छेड़ते। पर  उस समय तो हम बच्चों का यही सिनेमा था। सच कहूँ उस दिन दो, तीन नहीं पूरे पांच बार बाइस्कोप देखा था। ईनाम वाली चवन्नी भी पूरी खर्च हो गई थी।
कुल्फीवाला व बाइस्कोप वाला तो रोज़ आता, पर पैसे तो रोज-रोज नहीं होते थे। दूसरे दिन फिर घंटी बजी। रोज की तरह फिर बाहर निकली। परन्तु उस दिन मैं, उन बच्चों वाली लाइन में खड़ी थी, जिनकी आंखों में चवन्नी की चमक भर थी और जो कुल्फी के नाम पर सिर्फ लार घुटक रहे थे।
मैं उस दिन न कुल्फी खा सकती थी और न बाइस्कोप देख सकती थी। यहां तक कि सादी कुल्फी खाने के भी पैसे नहीं थे। बाइस्कोप वाले की बैंच पर उस दिन पूरे छैः बच्चे भी तो नहीं थे। तीन ही बच्चे बाइस्कोप देख रहे थे। बाकी और तीन छेदों में तो वो दूध वाले डिब्बे के ढक्कन बन्द किये था। रील चला ही रहा था, ग्रामोफोन पर रिकार्ड बजा ही रहा था, अरे बाकी ढक्कन खोल देता तो उसका क्या जा रहा था। लेकिन नहीं! खैर खिसयानी बिल्ली सी ताक में खड़ी रही। फिर धीरे से खाली बैंच पर जैसे ही मैनें बैठने की कोशिश की कि मुनिया ने मुझे कुल्हे से धक्का देकर खिसका दिया, मैं गिरते-गिरते बची और सपना टूट गया।

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बाहर बैठक में बैठे कभी ’कमथान साहब’ के मुंह लगा, कभी बटेश्वरी चाचा के तो कभी ’बहर साहब’ के । बारी-बारी सभी के लबों से होता हुआ बाबूजी के मुंह आ लगा। इसी बीच न जाने कितने विषयों पर चर्चा होती । कितने निर्णय लिये जाते । मसलहों व मशविरों के बाद पारिवारिक व सामाजिक फैसले लिए जाते। फिर कुछ शेर, क़ता, गज़लें व नज़्मों का आदान-प्रदान होता। छोटी-मोटी नशिस्त तो आए दिन यूं ही हो जाया करती थी । गर्म वार्ताओं के बीच ठण्डे होते हुक्के की जाने कितनी बार हम बच्चों को आग व तम्बाकू बदलनी पड़ती थी ।
कहने को तो ये नशा था परन्तु इसके पीछे छुपी हुई भारतीय संस्कृति की एकता को मैं आज तक महसूस करती हूँ । वो एक हुक्का ! एक परिवार नहीं , कई परिवार के बुजुर्गो को एक जगह एकत्र कर एक दूसरे के सुख-दुःख बांटता, सलाह मशविरा का नेक कार्य करता जैसे वो हुक्का नहीं समाज का व्यवस्थापक हो।
वो एक हुक्का जब-जब गुडगुड़ाता, कोई न कोई नेक कार्य करता। कभी आपसी सुख दुःख बांटता, कभी संयुक्त परिवारों को और-और मजबूत बनाता और कभी-कभी तो चिलम की चमकती आग के समान कई चिंतन चमक कर ऐसे कारगर हो जाते कि परिवार व समाज की दशा और दिशा ही बदल जाती। वो बेजान परन्तु जानदार हुक्का बैठक के केन्द्र में ससम्मान बारी-बारी से ऐसे गुड़गुड़ाता, मानो भारतीय संस्कृति की कहानी कह रहा हो।

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बहुत मज़ा आता था उसे पत्थर मारने में । हम बच्चों की टोली पत्थर मारते हुए जब तक उसे गली के बाहर नहीं खदेड़ देती,जब तक चैन नहीं लेती थी। वो भी पलट-पलट कर दौड़ाती थी। बहुत अच्छा लगता था चूहे-बिल्ली के खेल जैसा। वह अक्सर तीसरे-चैथे दिन आती और गली-मोहल्ले की साबित ईटें जमीन पर पटक कर टुकड़े-टुकडे़ कर देती और फिर अगली ईंट की तलाश में आगे बढ़ जाती। ये क्रम न जाने कितने वर्षो तक चलता रहा और  हम सब बच्चे उसे पगलिया-पगलिया कहकर चिढ़ाते रहे। पर बालमन ये न समझ पाया कि पागल कौन है? समझ आने पर पता लगा कि उसके तीन बच्चे साबित ईंट की कच्ची दीवार के नीचे दबकर मर गए थे शायद इसी वजह से उसे ईंट से चिढ हो गई थी। इस दुख को मातृत्व सहन नहीं कर पाया। परिणाम स्वरूप जीवन-पर्यन्त टूटे हृदय के असहनीय दुःख को ईंट के टुकड़ो में उजागर करता रहा।

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हर जगह होली जलने के बाद रंग खेला जाता, पर हमारे घर होलिका दहन वाले दिन ही सुबह रंग खेलने की परम्परा है जिसे रंगपासी कहते हैं। सबसे पहले रामजी चाचा हमारी मां पर रंग डालते थे सबसे बड़ी भाभी जो थीं । चाहे कितने अच्छे कपड़े पहने हो बदलने का कोई मौका न देते और रंग डाल देते। फिर जो रंग आंगन में खेला जाता वो देखने लायक होता। भरा पूरा परिवार, रंगों से से लिपे पुते चेहरे और-और पोते जाते। और जब श्याम चाचा वाली चाची को आंगन में घसीटा जाता तो उनके दोनो बच्चे दहाड़े मार-मार कर रोते। वो बच्चों के बहाने से भागतीं तब तक एक बाल्टी रंग और पड़ जाता। कोई किसी की नहीं सुनता । अन्त में सभी देवर भाभियों के गुलाल लगाकर पैर छूते।
पर आज जिस आंगन में होली जलती थी, खेली जाती थी वहाँ अब दीवार है। वहाँ रंगपासी नहीं उदासी है। रिश्तों में खटासी है और सबसे बड़ी बात अब राम जी चाचा भी तो नहीं हैं। होली का उत्साह तो वो अपने साथ ही ले गये। सारे रंग फीके पड़ गए। मेरी मां ने तो तबसे होली ही  नहीं खेली। रंगपासी नहीं रंगबासी हो गए।

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