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बेरोजगारों की पौध तैयार कर रहे हैं अधिकांश स्ववित्त-पोषित महाविद्यालय ……..नक़ल करा के दुकान तो चलाई जा सकती है परन्तु योग्य पौध तो योग्य शिक्षक ही शिक्षा के मंदिर में तैयार कर सकता है .बच्चों के भविष्य के प्रति हम शिक्षकों को अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी .

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माँ, मेरी माँ,जिसके आंसुओं से लिखी है इबारत मैंने

गुब्बारे सा  फूटा था गुबार ,

रोती रही थी अनवरत

धीरे-धीरे ….जी हल्का हुआ

सिसकियों के बीच

डबडबाते आंसुओं और थरथराते अधरों से

बही थी वेदना….

ढाढस ने तोड़ा था बाँध ,

बौनी हो गई थी संवेदना

परम्पराओं के मजबूत धागे में बंधी पीढ़ियाँ

दिल और दिमाग पर हावी थीं रूढ़ियाँ

मैं तीन की  ,माँ तेईस की

तिस पर फिर से भारी पाँव

बेटा जो जनना था……

सन इकसठ कि कड़कड़ाती ठण्ड में

दो बेटियों पर जना था बेटा ,मेरी माँ ने

बजने लगी थीं थालियाँ

घर आँगन क्या मोहल्ले में दौड़ गई थी खबर ,

बिजली…………सी

पहला पोता जो था ,

हाड़ कँपाने वाली ठण्ड

इतनी कि बड़े-बूढों के भी बर्दाश्त के बाहर

फिर एक नन्ही सी जान……..?

नलों में पानी तक जम गया था ,

पानी क्या ….खून भी जम गया था ,अगली सुबह

जब चीख पड़ी थी माँ

थम गईं थीं साँसें ,बर्फ हो गई थी जान

फट गई थी धरती ,गिर पड़ाथा आसमान

नहीं रहा नवजात ……..

नि:शब्द ,निस्तेज , निष्प्राण,

काठ की  हो गई थी माँ

पागल …..पूरी पागल …..कहने लगे थे लोग

शुरू हो गई थी झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र

घर आने लगे थे तांत्रिक ……ओझा …..

सताई जाने लगी थी माँ

क्यूँ नहीं समझ पाए ,लोग…..

कोख-जाए  के बिछोह का दर्द जब फूटता है तो ..

क्षत- विक्षत कर देता है ,और…….

जब धीरज टूटता है ,तो टूट जाते हैं बाँध ,रोके नहीं रुकता है सैलाब

क्षीण से क्षीणतर होतिहोती गई माँ

चक्कर खाकर गिर-गिर पड़ती माँ

बीमारी ने आज तक दामन नहीं छोड़ा है

उसके चेहरे की हड्डियां तो मेरे बच्चे भी गिन लेते हैं

……………कुछ दिनों से देख रही हूँ

माँ की गर्दन स्थिर नहीं रहती ,

कुछ-कुछ देर में हिलने लगती है ….

लेकिन माँ कितनी स्थिर है

आज भी ………

अपनी पीड़ाओं के प्रति निर्लिप्त ,निस्संग

अपने ही बच्चों की चिंता में निमग्न ,

लड़ रही है अपने शरीर से ……

जिसके ऊपर कभी रूढ़ियाँ हावी थीं

और आज उम्र …….

मैं तब भी कुछ नहीं कर पाई

और आज भी     \

डा.वीणा श्रीवास्तव

सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय  मनरेगा…….

मनरेगा का धन ग़रीबों के पेट में नहीं माननीयों की तिजोरी में ‘

मजदूरों के बजाय जे सी बी मशीनों से नहरों की भराई करा श्रमदान घोषित ‘

और आप कहते हैं मन……रे…….गा…….

कैसे सम्भव है?

वीणा

एक छोटी सी बच्ची को सिर पर

गोबर से भरी डलिया लिए हुए

जब मैंने देखा ‘ मैं तब नहीं चौंकी

चौंकी तब …जब मैंने उसे एक स्कूल के सामने

अन्दर पढ़ते हुए बच्चों को

एकटक निहारते हुए पाया

हांलाकि उसकी पीठ जरूर मेरी ओर थी

लेकिन मैं……

उसके चेहरें के एक एक भाव पढ़ रही थी

वो देख रही थी पढ़ते बच्चों को

और खुश हो रही थी

वो सोच नहीं रही थी ‘कि

काश मैं भी पढ़ती होती ‘ क्योंकि

उसकी उम्र सोचने की  भी नहीं थी

और ………

जिनकी उम्र सोचने की  थी

उन्हें पेट भरने की चिंता

कुछ और सोचने भी नहीं देती

जब-तब ‘कभी कुछ सोचने की कोशिश करते

पेट फिर से खाली हो जाता.

पश्चिम की आंधी में देशी बच्चे बहने आज लगे हैं

साठ लाख का बुरा है क्या ये पैकेज  कहने आज लगे हैं

लैपटॉप मोबाइल इन्टरनेट ही अब इनकी दुनियाँ है

गूगल याहू डॉट कॉम के घर में रहने आज लगे हैं

बुलंदियां छू रहे हो तुम जिन बुनियादों पर खड़े हुए हो

मुड़कर तो देखो वो खण्डहर ढहने आज लगे हैं.

नारी जीवन आज तुम्हारे यही मायने

पंख लगाकर खुले गगन में उड़ी उड़ानें

आसमान हो, अंतरिक्ष या पार क्षितिज के

अब सब लगते घर जैसे जाने पहचाने

नारी हो नर से आगे या नर नारी से आगे

कोई फरक नहीं पड़ता जो टूट न पायें धागे

आसमान विस्तृत सागर सी जब सोच हमारी होगी

तब लहराएगा परचम दुनियाँ में सबसे आगे

कृष्ण होली खेलने के लिए गलियों में निकलते हैं उन्हें देखते ही सारी गोपियाँ छुप जाती हैं लेकिन तभी एक कमसिन गोपी उनके हाँथ आ जाती है और वो उसी से होली खेलने लगते हैं. तो वह गोपी क्या कहती है…

बारी उमरिया है मोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

रंग नहीं आवै ढंग नहीं आवे

आवै न मोहे जोरा जोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

तोरे लाने मैं ल्याऊँ दई माखन

करनै परै न तोए चोरी

ओ कान्हा मोसें खेलो न होली

लेकिन कृष्ण नहीं मानते हैं अंत में परेशान होकर वो गोपी कहती है ….

जो तुम मोरी एकऊ न मानों

तो, होरी में जाये ऐसी होरी

आओ कान्हा खेलूं मैं होरी