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Posts Tagged ‘कुल्फी और बाइस्कोप’

शाम को लगभग चार-पांच बजे घंटियों की  आवाज़ सुनते ही गली के लगभग सभी बच्चे चैतन्य हो जाया करते थे। ‘पैवलाव’ के सिद्वान्त सा सौ फीसदी सम्बन्ध घंटी, लार व कुल्फी के बीच जो जुड़ा हुआ था।
अमूमन लोगों को कुल्फी वाले व बाइस्कोप वाले की घंटियों में फर्क नज़र नहीं आता था। पर मैं समझ जाती थी कि ये  कुल्फी वाला है और वो बाइस्कोप वाला। दोनों की घंटियों की ध्वनि में भी अन्तर था और घंटी में बंधी डोरी खीचने की स्टाइल में भी। जिस दिन पास में पैसे होते, इन्तज़ार बहुत खलता। घंटी बजते ही बाहर निकल आती। पांच पैसे मे सादी कुल्फी और दस पैसे में ईनाम वाली। ईनाम वाली कुल्फी में कुल्फी के साथ ही पैसे भी जमे रहते थे। किसी मे दो पैसे, किसी में तीन, किसी मे पांच, किसी मे दस और किसी-किसी में चवन्नी। कुल्फी निकालते समय कभी भगवान का नाम लेती व कभी-कभी दस की उल्टी गिनती गिनकर निकालती।
उस दिन उल्टी गिनती गिनकर पांचवे नं0 की कुल्फी उसके बाॅक्स से निकाली थी, क्योंकि पांच मेरा लकी नं0 था। कुल्फी में जमी चवन्नी देखकर आंखों की चमक दुगुनी व क्षणिक अमीर होने के एहसास से फूल गई थी। ठेले के पास ख़डे अन्य बच्चों के चेहरे देख अपनी जीत दर्शाती धीरे-2 कुल्फी का आनन्द ले रही थी।
इसी बीच बाइस्कोप वाला घंटी बजाता हुआ गली में आया। मन और प्रसन्न हो गया, क्योंकि आज तो पैसे भी बहुत थे। उसके ठेले पर बाइस्कोप तथा उसी के बगल में एक लम्बी लकड़ी की बैंच उल्टी रखी होती थी। वो जहाँ बच्चों की भीड़ देखता, वहीं ठेला रोक कर बैंच उतार देता। हम बच्चे एक दूसरे को धक्का देते हुए बैंच पर अपनी जगह पा लेते। बाइस्कोप में अन्दर देखने के लिए छः छेद होते थे, जिनमें ढक्कन लगे रहते थे। वो जैसे ही ढक्कन हटाता, बच्चे अपना-अपना चेहरा उन छेदों पर फिट कर लेते और दोनो साइड हाथों से बन्द कर लेते। इससे एक तो बाहर की रौशनी अन्दर नहीं आती और दूसरा जो महत्वपूर्ण था कि कोई दूसरा बच्चा साइड से अन्दर झांक न ले।
बाइस्कोप में सबसे पहले रंग बिरंगी टूटी चूडियों की भिन्न-भिन्न कलाकृतियां दिखतीं। कभी गोल, त्रिकोण, चैकोर, व ष्टकोणींय भिन्न-भिन्न आकार के आलेखन दिखाता। इतनी देर में बाकी सैटिंग कर लेता था । बाइस्कोप के ऊपर रखे ग्रामोफोन में रिकार्ड लगाकर गाने बजाता और अन्दर बाइस्कोप मे भिन्न-भिन्न पत्र-पत्रिकाओं से बेतरतीब काटे गए नायक-नायिकाओ के चित्र एक रील में चिपके से चल पड़ते। रिकार्ड में गाना बजता ‘हवा में उड़ता जाए मेरा लाल दुपटटा मलमल का’ और कभी ’कजरा मोहब्बत वाला’। गीतों व चित्रों में कोई तारतम्य नहीं होता। भिन्न-भिन्न भूमिकाओं में मूक चित्र आगे खिसकते जाते और साथ में गीत अपनी अलग धुन छेड़ते। पर  उस समय तो हम बच्चों का यही सिनेमा था। सच कहूँ उस दिन दो, तीन नहीं पूरे पांच बार बाइस्कोप देखा था। ईनाम वाली चवन्नी भी पूरी खर्च हो गई थी।
कुल्फीवाला व बाइस्कोप वाला तो रोज़ आता, पर पैसे तो रोज-रोज नहीं होते थे। दूसरे दिन फिर घंटी बजी। रोज की तरह फिर बाहर निकली। परन्तु उस दिन मैं, उन बच्चों वाली लाइन में खड़ी थी, जिनकी आंखों में चवन्नी की चमक भर थी और जो कुल्फी के नाम पर सिर्फ लार घुटक रहे थे।
मैं उस दिन न कुल्फी खा सकती थी और न बाइस्कोप देख सकती थी। यहां तक कि सादी कुल्फी खाने के भी पैसे नहीं थे। बाइस्कोप वाले की बैंच पर उस दिन पूरे छैः बच्चे भी तो नहीं थे। तीन ही बच्चे बाइस्कोप देख रहे थे। बाकी और तीन छेदों में तो वो दूध वाले डिब्बे के ढक्कन बन्द किये था। रील चला ही रहा था, ग्रामोफोन पर रिकार्ड बजा ही रहा था, अरे बाकी ढक्कन खोल देता तो उसका क्या जा रहा था। लेकिन नहीं! खैर खिसयानी बिल्ली सी ताक में खड़ी रही। फिर धीरे से खाली बैंच पर जैसे ही मैनें बैठने की कोशिश की कि मुनिया ने मुझे कुल्हे से धक्का देकर खिसका दिया, मैं गिरते-गिरते बची और सपना टूट गया।

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