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Posts Tagged ‘रंग पासी’

हर जगह होली जलने के बाद रंग खेला जाता, पर हमारे घर होलिका दहन वाले दिन ही सुबह रंग खेलने की परम्परा है जिसे रंगपासी कहते हैं। सबसे पहले रामजी चाचा हमारी मां पर रंग डालते थे सबसे बड़ी भाभी जो थीं । चाहे कितने अच्छे कपड़े पहने हो बदलने का कोई मौका न देते और रंग डाल देते। फिर जो रंग आंगन में खेला जाता वो देखने लायक होता। भरा पूरा परिवार, रंगों से से लिपे पुते चेहरे और-और पोते जाते। और जब श्याम चाचा वाली चाची को आंगन में घसीटा जाता तो उनके दोनो बच्चे दहाड़े मार-मार कर रोते। वो बच्चों के बहाने से भागतीं तब तक एक बाल्टी रंग और पड़ जाता। कोई किसी की नहीं सुनता । अन्त में सभी देवर भाभियों के गुलाल लगाकर पैर छूते।
पर आज जिस आंगन में होली जलती थी, खेली जाती थी वहाँ अब दीवार है। वहाँ रंगपासी नहीं उदासी है। रिश्तों में खटासी है और सबसे बड़ी बात अब राम जी चाचा भी तो नहीं हैं। होली का उत्साह तो वो अपने साथ ही ले गये। सारे रंग फीके पड़ गए। मेरी मां ने तो तबसे होली ही  नहीं खेली। रंगपासी नहीं रंगबासी हो गए।

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