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Posts Tagged ‘वह तोड़ती ईंट’

बहुत मज़ा आता था उसे पत्थर मारने में । हम बच्चों की टोली पत्थर मारते हुए जब तक उसे गली के बाहर नहीं खदेड़ देती,जब तक चैन नहीं लेती थी। वो भी पलट-पलट कर दौड़ाती थी। बहुत अच्छा लगता था चूहे-बिल्ली के खेल जैसा। वह अक्सर तीसरे-चैथे दिन आती और गली-मोहल्ले की साबित ईटें जमीन पर पटक कर टुकड़े-टुकडे़ कर देती और फिर अगली ईंट की तलाश में आगे बढ़ जाती। ये क्रम न जाने कितने वर्षो तक चलता रहा और  हम सब बच्चे उसे पगलिया-पगलिया कहकर चिढ़ाते रहे। पर बालमन ये न समझ पाया कि पागल कौन है? समझ आने पर पता लगा कि उसके तीन बच्चे साबित ईंट की कच्ची दीवार के नीचे दबकर मर गए थे शायद इसी वजह से उसे ईंट से चिढ हो गई थी। इस दुख को मातृत्व सहन नहीं कर पाया। परिणाम स्वरूप जीवन-पर्यन्त टूटे हृदय के असहनीय दुःख को ईंट के टुकड़ो में उजागर करता रहा।

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